भारतीय सेना सतर्क, रक्षात्मक पोजिशनों को किया मजबूत

सैनिक वाहनों की गड़गड़ और हलचल इस बात का आभास दे रही है की कुछ खतरे की आशंका इस सेक्टर में है। यह खतरा पाकिस्तान की ओर से महसूस किया जा रहा है क्योंकि यह सेक्टर भारतीय सेना के लिए जहां महत्वपूर्ण ही नहीं बल्कि सबसे नाजुक भी माना जाता रहा है। नतीजतन भारतीय सेना इस सारे सेक्टर में, जहां सिर्फ पहाड़ और नदी नालों के अतिरिक्त तेजी से बहता चिनाब दरिया भी है तो मनवर तवी नदी भी, भारतीय सेना रक्षात्मक तैयारियों में जुटी है। उसे ऐसा इसलिए करना पड़ रहा है क्योंकि पाक सेना इस क्षेत्र की कई सीमांत चौकिओं पर कब्जे के इरादों से कई आक्रामक हमले कर चुकी है। यह बात अलग है कि भारतीय सेना के वीर बहादुरों ने भारत की धरती की ओर बढ़ते पाक सैनिकों के नापाक कदमों को ही जमीन से उखाड़ दिया। भारतीय सेना के जवानों की ताकत, हिम्मत तथा बहादुरी पर किंचित मात्र भी शंका नहीं की जा सकती लेकिन बावजूद वह रक्षात्मक तैयारियों में इसलिए जुटी है क्योंकि यह क्षेत्र नाजुक है। नाजुक होने के कई कारणों में एक कारण बार-बार अपना रूख मोड़ लेने वाली मनवर तवी नदी है जो राजौरी से निकल कर पाकिस्तान की ओर इस सेक्टर से घुसती है तो वे कालीधार पर्वत श्रृंखला के पहाड़ भी हैं जो भारतीय सेना के लिए अक्सर घातक इसलिए साबित होते हैं क्योंकि पाक सेना ने 1947 के भारत पाक युद्ध में इसके ऊंचाई वाले शिखिरों पर कब्जा कर लिया था। पाक सेना की ऊंचाई वाली पोजिशनें ही भारतीय सेना के लिए घातक साबित हो रही हैं। यह 1965 तथा 1971 के युद्धों में भी घातक साबित हुई थीं। सनद रहे कि 1965 में पाकिस्तान ने भारत के छंब क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था तो 1971 में वह उसके आगे ज्यौड़ियां तक आ गया था। हालांकि ताशकंद समझौते के उपरांत भारत को ज्यौड़ियां तो वापस मिल गया था मगर छंब का महत्वपूर्ण क्षेत्र पाकिस्तान ने वापस नहीं लौटाया था। पिछले युद्धों की दास्तानों को भारतीय सेना पुनः नहीं दोहराना चाहती है। यही कारण है कि उसे इस सेक्टर में हमेशा ही चौकस, सतर्क तथा रक्षात्मक पोजिशन में रहना पड़ता है। इसी सतर्कता तथा चौकस परिस्थितियों का परिणाम है कि भारतीय सेना पाक सेना की उन कई नापाक कोशिशों को नाकाम बना चुकी है जिनमें भारतीय सीमा चौकिओं पर कब्जे के प्रयास किए गए थे। करगिल युद्ध के उपरांत भारतीय सेना को इस नाजुक माने जाने वाले सेक्टर में कुछ अधिक ही ताकत झौंकनी पड़ रही है। सिर्फ ताकत ही नहीं बल्कि अधिक सतर्कता, अधिक चौकसी के साथ ही अधिक रक्षात्मक पोजिशनों का निर्माण भी करना पड़ रहा है। एलओसी के इस सेक्टर की दुखदायक कहानी यह है कि यह आधा एलओसी पर पड़ता है तो आधा इंटरनेशनल बार्डर पर अर्थात इंटरनेशनल बार्डर यहीं आकर खत्म होता है और एलओसी यहीं से आंरभ होती है। नतीजतन भारतीय सेना को अपनी प्रत्येक फौजी कार्रवाई को ध्यान में रख कर करना पड़ता है ताकि कहीं पाक सेना को यह आरोप लगाने का अवसर न मिले कि भारतीय सेना एलओसी पर सैनिक जमाव कर रही है।

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