वृद्ध बोझ नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और मूल्यों के संरक्षक हैं

अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस- 1 अक्टूबर, 2025

The elderly are not a burden, but guardians of culture, tradition and values

The elderly are not a burden, but guardians of culture, tradition and values
The elderly are not a burden, but guardians of culture, tradition and values

संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस के रूप में घोषित किया है। इस दिवस का उद्देश्य वृद्धों के अधिकारों, उनकी गरिमा और उनके योगदान को रेखांकित करना है। यह दिन हमें यह सोचने को विवश करता है कि जीवन के इस अंतिम पड़ाव में, जिसे कभी सम्मान और अनुभव का प्रतीक माना जाता था, आज वह उपेक्षा, अकेलेपन और असुरक्षा का पर्याय क्यों बन गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वर्ष 2030 तक 60 वर्ष से अधिक आयु के लोग पूरी दुनिया में 1.4 अरब से अधिक हो जाएंगे और 2050 तक यह संख्या दोगुनी होकर लगभग 2.1 अरब तक पहुँच जाएगी। विकसित देशों में वृद्धजन आबादी का चौथाई हिस्सा बन चुके हैं, वहीं विकासशील देशों में भी उनकी संख्या तेज़ी से बढ़ रही है। लेकिन विडंबना यह है कि इस बढ़ती जनसंख्या के साथ उनकी सुरक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक भागीदारी की चुनौतियां भी बढ़ रही हैं। यूरोप और अमेरिका जैसे देशों में वृद्धजन पेंशन और हेल्थकेयर से तो सुरक्षित हैं, परंतु वहाँ अकेलेपन और मानसिक अवसाद की समस्या विकराल है। एशिया और अफ्रीका में, जहां परिवार व्यवस्था मजबूत मानी जाती थी, अब संयुक्त परिवार टूटने से वृद्धजन आर्थिक व सामाजिक असुरक्षा से जूझ रहे हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस की शुरुआत 1991 में हुई थी और इसका उद्देश्य बढ़ती उम्र की आबादी के अवसरों और चुनौतियों के बारे में जागरूकता बढ़ाना तथा वृद्धजनों के अधिकारों और योगदान को पहचानना है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित इस दिवस पर वृद्धजनों को समर्थन देने वाली प्रणालियों को मज़बूत करने का आह्वान किया जाता है और उनके मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य देखभाल के लिए एकीकृत दृष्टिकोण को प्रोत्साहित किया जाता है। समाज में उनके बहुमूल्य योगदान को मान्यता देना, उनके अधिकारों की रक्षा करना, वृद्धजनों को स्वास्थ्य सेवाएं, देखभाल, सामाजिक सहायता प्रदान करने वाली प्रणालियों को मज़बूत करना, वृद्धजनों को वैश्विक विकास प्रयासों में शामिल करना और शहरी वातावरण को उनके लिए अधिक समावेशी बनाना आदि इस दिवस को मनाने के उद्देश्य हैं। इस दिवस को मनाते हुए वृद्ध व्यक्तियों की डिजिटल प्रौद्योगिकियों तक समान पहुँच प्रदान करने के महत्व पर जोर देना और यह सुनिश्चित करना कि सभी आयु वर्गों के लिए समानता को बढ़ावा दिया जाए और वृद्ध व्यक्तियों के मानवाधिकारों का पालन हो आदि बातों पर विशेष बल दिया जाता है।

इस दिवस की 2025 की थीम ‘समावेशी भविष्य के लिए वृद्धजनों की आवाज़ को सशक्त बनाना’ है, जो वृद्धजनों की आवाज़, अनुभव और ज्ञान को पहचानने तथा उनके अनुभवों के आधार पर समावेशी समाजों के निर्माण पर जोर देती है। यह थीम इस बात पर प्रकाश डालती है कि वृद्धजन लचीले और समतामूलक समाज बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्नत एवं आदर्श समाज के निर्माण में वृद्धजनों की आवाज़, उनके दृष्टिकोण और अनुभव को विशेष महत्व है। वृद्धावस्था में कठिनाइयां अनेक रूपों में सामने आती हैं। स्वास्थ्य की दृष्टि से हृदय रोग, मधुमेह, जोड़ों के दर्द और डिमेंशिया जैसी बीमारियाँ उन्हें घेरे रहती हैं, परंतु चिकित्सा सुविधाओं तक उनकी पहुंच सीमित है। आर्थिक दृष्टि से पेंशन व सामाजिक सुरक्षा योजनाएं हर वृद्धजन तक नहीं पहुँचतीं और ग्रामीण क्षेत्रों में यह स्थिति और भी दयनीय है। सामाजिक स्तर पर आधुनिक जीवन की दौड़ में वृद्धजन अकेलेपन, उदासी और उपेक्षा से पीड़ित हैं। मानसिक दृष्टि से आत्मसम्मान को ठेस, भूमिका से वंचित होना और बेकारपन का एहसास उन्हें भीतर तक तोड़ देता है।

भारत में वृद्धों की स्थिति अधिक चिन्ताजनक है। जबकि वृद्धजन भारतीय समाज की धरोहर मानी जाती रही हैं, उन्हें अनुभव और ज्ञान का भंडार मानते हैं। इसके बावजूद यदि हम उन्हें उपेक्षित करेंगे तो यह केवल अन्याय ही नहीं, बल्कि सभ्यता एवं संस्कृति की पराजय होगी। वृद्धजन केवल जीवित बोझ नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, परंपरा और मूल्यों के संरक्षक हैं। उनका सम्मान करना न केवल हमारा नैतिक कर्तव्य है बल्कि एक बेहतर, संवेदनशील और संतुलित समाज के निर्माण की अनिवार्यता है। भारत जैसे विकसित देश के नागरिकों की औसत आयु 60 वर्ष से अधिक 65 हो रही है। जीवन प्रत्याशा में वृद्धि के कारण देश में वृद्धजन की संख्या बढ़ रही है, देश में 2011 में 10.38 करोड़ वरिष्ठ नागरिक थे, जिनके 2050 तक बढ़कर 30 करोड़ होने का अनुमान है। अनुमान है, कि 2050 तक हर चौथा भारतीय बुजुर्ग होगा। यह बात भारत के नीति आयोग ने कही है, इसी के कारण बुजुर्गों की समस्याएं बढ़ती जा रही हैं।

भारत में परंपरागत भारतीय परिवार व्यवस्था में वृद्धजनों को सम्मान, सुरक्षा और निर्णय लेने की अहम भूमिका प्राप्त थी। लेकिन आज शहरीकरण, परमाणु परिवार, प्रवास और उपभोक्तावादी सोच ने उनकी भूमिका को हाशिए पर पहुँचा दिया है। परिवार के भीतर उन्हें आर्थिक बोझ समझा जाने लगा है, पीढ़ीगत टकराव और मूल्यों में बदलाव ने दूरी बढ़ा दी है, नौकरी-पेशा बच्चों के व्यस्त जीवन में धैर्य और देखभाल की कमी स्पष्ट हो रही है और संपत्ति तथा अधिकारों को लेकर तनाव आम हो गया है। इसके परिणामस्वरूप वृद्धजन शारीरिक बीमारियों से जूझते हैं, पर पर्याप्त चिकित्सा नहीं मिलती। वे अकेलेपन और मानसिक अवसाद का शिकार होते हैं,उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाता है और कभी-कभी घरेलू हिंसा और संपत्ति विवादों में भी उलझना पड़ता है।

प्रश्न है कि दुनिया में वृद्ध दिवस मनाने की आवश्यकता क्यों हुई? क्यों वृद्धों की उपेक्षा एवं प्रताड़ना की स्थितियां बनी हुई है? चिन्तन का महत्वपूर्ण पक्ष है कि वृद्धों की उपेक्षा के इस गलत प्रवाह को रोके। क्योंकि सोच के गलत प्रवाह ने न केवल वृद्धों का जीवन दुश्वार कर दिया है बल्कि आदमी-आदमी के बीच के भावात्मक फासलों को भी बढ़ा दिया है। वृद्धावस्था जीवन की सांझ है। वस्तुतः वर्तमान के भागदौड़, आपाधापी, अर्थ प्रधानता व नवीन चिन्तन तथा मान्यताओं के युग में जिन अनेक विकृतियों, विसंगतियों व प्रतिकूलताओं ने जन्म लिया है, उन्हीं में से एक है वृद्धों की उपेक्षा। वस्तुतः वृद्धावस्था तो वैसे भी अनेक शारीरिक व्याधियों, मानसिक तनावों और अन्यान्य व्यथाओं भरा जीवन होता है और अगर उस पर परिवार के सदस्य, विशेषतः युवा परिवार के बुजुर्गों/वृद्धों को अपमानित करें, उनका ध्यान न रखें या उन्हें मानसिक संताप पहुँचाएं, तो स्वाभाविक है कि वृद्ध के लिए वृद्धावस्था अभिशाप बन जाती है।

इन समस्याओं का समाधान केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए परिवार, समाज और सरकार-सभी स्तरों पर समन्वित प्रयास की आवश्यकता है। परिवार व्यवस्था का पुनर्जीवन जरूरी है, बच्चों में बचपन से ही सेवा, सहानुभूति और सम्मान की भावना विकसित की जाए। सामाजिक सुरक्षा के दायरे का विस्तार हो, पेंशन, स्वास्थ्य बीमा और वृद्धाश्रमों की गुणवत्ता में सुधार किया जाए। स्वास्थ्य सेवाओं में जेरियाट्रिक देखभाल को प्राथमिकता दी जाए, प्रत्येक नगर और गाँव में वृद्धजन के लिए स्वास्थ्य केंद्र स्थापित हों। मानसिक स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया जाए, अकेलेपन से लड़ने के लिए सामुदायिक केंद्र, क्लब और वृद्धजन मंच सक्रिय किए जाएँ। वृद्धजनों को डिजिटल तकनीक से जोड़कर उन्हें सामाजिक और पारिवारिक संवाद में सक्रिय बनाया जाए। माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम 2007 का प्रभावी क्रियान्वयन किया जाए और समाज में उनके अधिकारों के प्रति जागरूकता लाई जाए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जब नया भारत, विकसित भारत और समृद्ध भारत का निर्माण हो रहा है, तब यह आवश्यक है कि इस विकास यात्रा में वृद्धजन उपेक्षित न हों बल्कि उन्हें इसका सक्रिय भागीदार बनाया जाए। न्यूनतम पेंशन की गारंटी दे और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ हर वरिष्ठ नागरिक तक पहुंचाए। साथ ही “डिजिटल इंडिया” और “स्किल इंडिया” जैसी योजनाओं से वृद्धजनों को जोड़ा जाए ताकि वे सामाजिक संवाद और आर्थिक गतिविधियों में सक्रिय बने रहें। वृद्धाश्रमों और डे-केयर सेंटर्स की गुणवत्ता और संख्या बढ़ाई जाए, मानसिक स्वास्थ्य के लिए काउंसलिंग केंद्र स्थापित हों और “सेवा भाव” को बढ़ावा देने वाले राष्ट्रीय अभियान चलाए जाएँ। जब भारत आत्मनिर्भरता और वैश्विक नेतृत्व की ओर बढ़ रहा है, तब उसके अनुभव-संपन्न वृद्धजन राष्ट्र की अमूल्य पूंजी हैं, इसलिए मोदी सरकार को उनके लिए संवेदनशील और समग्र कल्याणकारी नीतियां लागू करनी चाहिए।

प्रेषकः
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

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