कैनेडा की अगली डिफेंस फाइट खर्च को लेकर नहीं, बल्कि भरोसे को लेकर होगी

Canada's next defense battle will not be about spending, but about trust.

– सरकार को इस पतझड़ में कैनेडियन को यह दिखाना होगा कि वह नाटो से जुड़ी अपनी महत्वाकांक्षाओं के लिए धन का इंतजाम कैसे करेगी?

Canada's next defense battle will not be about spending, but about trust.
Canada’s next defense battle will not be about spending, but about trust.

टोरंटो। अगर नाटो सम्मेलन के बाद कैनेडा और दूसरे सहयोगी देशों के सामने खड़ी उलझन को एक लाइन में बताना हो, तो वह लाइन हो सकती है: ‘शॉ मी द मनी’। यह बात घिसी-पिटी लग सकती है, हो सकता है कि यह थोड़ी पुरानी भी लगे। आखिर यह 1996 की फिल्म ‘जेरी मैगुायर’ का एक डायलॉग है। लेकिन शायद यह लोगों की गहरी भावना को सबसे अच्छे तरीके से बयां करता है।

ब्रिटेन को हाल ही में यह कड़वा अनुभव हुआ कि डिफेंस और सिक्योरिटी पर खर्च होने वाले भारी-भरकम धन का हिसाब-किताब रखना एक अहम राजनीतिक और पॉलिसी से जुड़ा मुद्दा है, जिससे नुकसान हो सकता है और मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। और इससे यह सवाल भी उठता है कि क्या कार्नी सरकार में किसी ने ब्रिटेन के जल्द ही पूर्व प्रधानमंत्री बनने वाले कीर स्टारमर के पतन पर ध्यान दिया है। एक ऐसा पतन जो तेजी से और बदनामी के साथ हुआ और जिसकी वजह थी डिफेंस पर अधिक खर्च के लिए धन का इंतजाम कैसे किया जाए, इसे लेकर पैदा हुआ संकट।

अगर आप यूरोपीय राजनयिकों से बात करें, तो यह कहना भी सही होगा कि कुछ सहयोगी देशों की राजधानियों में नाटो के नए पांच प्रतिशत निवेश के लक्ष्य तक पहुँचने के लिए जरुरी आर्थिक बोझ को लेकर दबी-छुपी चिंता है। सच तो यह है कि कैनेडा और यूनाइटेड किंगडम की आर्थिक और वित्तीय स्थिति अलग-अलग है। कार्नी सरकार के पास उधार लेने की अधिक गुंजाइश और क्षमता है, जबकि स्टारमर के पास बहुत कम गुंजाइश है और उन पर राजनीतिक रुप से संवेदनशील सरकारी जिम्मेदारियों का बोझ है।

मिलिट्री खर्च को लेकर ब्रिटेन में मची राजनीतिक उथल-पुथल असल में टैंक, युद्धपोत या फाइटर जेट के बारे में नहीं थी। यह उस योजना की विश्वसनीयता के बारे में थी जिसके तहत सरकार के दूसरे हिस्सों के बजट को नुकसान पहुँचाए बिना ये चीजें खरीदी जानी थीं। मंत्रियों ने सेना को फिर से मजबूत करने का वादा किया, फिर इस बात पर झगड़ा किया कि इसके लिए धन कहाँ से आएँगा और जब हिसाब-किताब से कोई भरोसेमंद योजना नहीं बन पाई, तो डिफेंस सेक्रेटरी ने इस्तीफा दे दिया।

इस आग को भड़काने वाली चिंगारी थी यू.के. की डिफेंस निवेश योजना की प्रस्तुति, जिसका मकसद मंगलवार को अंकारा में होने वाले नाटो सम्मेलन के लिए माहौल तैयार करना था, जहाँ सहयोगी देशों से उम्मीद की जा रही थी कि वे पाँच प्रतिशत के लक्ष्य तक पहुँचने की अपने प्रस्ताव पेश करेंगे। ब्रिटिश सरकार के पूर्व अधिकारी और अब यू.के. स्थित थिंक-टैंक ‘रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट’ में मिलिट्री साइंसेज के डायरेक्टर मैथ्यू सैविल ने कहा, उस समिट में बुरी तरह आलोचना से बचने के लिए यू.के. की तरफ से कुछ भरोसेमंद पेश करने की जरूरत थी।’

नाटो के डिफेंस पर खर्च करने के वादे को अलग-अलग हिस्सों में बांटा गया है, 3.5 प्रतिशत सीधे मिलिट्री इन्वेस्टमेंट के लिए और 1.5 प्रतिशत डिफेंस इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए। दोनों लक्ष्य 2035 तक पूरे करने हैं। यू.के. की योजना की अधिकतर आलोचना मिलिट्री वाले हिस्से को लेकर हुई, जिसमें लक्ष्य हासिल करने का वादा तो किया गया, लेकिन उससे जुड़े आंकड़े या तो सही नहीं थे या मौजूद ही नहीं थे।

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उन्होंने आगे कहा कि अगले चार सालों में यू.के.के डिफेंस बजट में लगभग 15 बिलियन डॉलर जुडऩे की उम्मीद थी, जिससे दशक के अंत तक यह 2.7 प्रतिशत हो जाएगा।Ó ‘इसका मतलब यह है कि न केवल इसके रास्ते के बारे में कोई जानकारी नहीं है, बल्कि मुझे इस बात पर भी शक है कि क्या कोई भरोसेमंद रास्ता है भी या नहीं, क्योंकि इसके लिए 2030 के बाद खर्च में काफी बढ़ोतरी की जरुरत होगी। मुझे नहीं लगता कि यह भरोसे के पैमाने पर खरा उतरता है।Ó

मंत्रियों का विरोध :

सैविल का अनुमान था कि 2035 तक नाटो का लक्ष्य हासिल करने के लिए यू.के. को हर साल अतिरिक्त 25 बिलियन डॉलर इन्वेस्ट करने की जरुरत थी। जब यह साफ हो गया कि ऐसा नहीं होने वाला है, तो मंत्रियों ने विरोध शुरु कर दिया। पिछले महीने जॉन हीली ने डिफेंस सेक्रेटरी के पद से इस्तीफा दे दिया, जिसकी वजह खर्च को लेकर बना गतिरोध बताया गया। इस विवाद के बाद स्टारमर की कैबिनेट से कई लोगों ने इस्तीफा दिया और आखिरकार प्रधानमंत्री को भी पद छोडऩा पड़ा।े

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