ईरान को ट्रंप की चेतावनी, आज रात 47 साल की हिंसा का होगा अंत

Trump warns Iran: 47 years of violence will end tonight

Trump warns Iran: 47 years of violence will end tonight
Trump warns Iran: 47 years of violence will end tonight

ईरान को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फिर चेतावनी दी है. उन्होंने अपने सोशल मीडिया ट्रूथ सोशल पर लिखा कि आज रात एक पूरी सभ्यता खत्म हो सकती है, जिसे फिर कभी वापस नहीं लाया जा सकेगा. मैं ऐसा नहीं चाहता, लेकिन शायद ऐसा हो जाए. हालांकि, अब ईरान में पूरा सत्ता परिवर्तन हो चुका है, जहां समझदार और कम कट्टरपंथी मानसिकता वाले लोग हावी हैं. कौन जानता है? शायद कुछ क्रांतिकारी और अच्छा भी हो सकता है. यह दुनिया के इतिहास का बहुत अहम पल हो सकता है. 47 साल से चल रहे भ्रष्टाचार, दबाव और हिंसा का अंत हो सकता है. ईरान के लोगों को शुभकामनाएं.

क्यों नहीं हो पाया होर्मुज समझौता

रूस, चीन, पाकिस्तान, तुर्की समेत 45 देशों ने अमेरिका और ईरान के बीच समझौते का प्रयास किया, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के दिए डेडलाइन (मंगलवार) तक दोनों देश के बीच कोई समझौता नहीं हो पाया. ईरान ने पाकिस्तान के आखिरी प्रस्ताव को भी यह कहते हुए ठुकरा दिया कि जंग में स्थाई विराम ही एकमात्र विकल्प है. पाकिस्तान ने अमेरिका की तरफ से अस्थाई युद्धविराम का एक प्रस्ताव तेहरान को भेजा था.

सहमति नहीं बनने के बाद ईरान में अमेरिका और इजराइल का संयुक्त हमला फिर से शुरू हो गया है. एक्सियोस के मुताबिक ईरान के खार्ग आईलैंड पर अमेरिका ने मंगलवार को ताबड़तोड़ हमले किए. इधर, इजराइल ने उसके ट्रेन ठिकानों को निशाना बनाया.

गारंटी देने को कोई तैयार नहीं- समझौते के तहत ईरान की जो सबसे पहली शर्त है. वो यह कि आने वाले समय में उस पर कोई हमला नहीं होगा, इसकी गारंटी मिले. इस गारंटी के बिना ईरान कोई समझौता नहीं चाहता है. ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची का कहना है कि हम न्यूक्लियर पर जब बात कर रहे थे, तब पहले भी 2 बार अटैक हो चुका है. ऐसे में हम अमेरिका पर कैसे विश्वास कर सकते हैं?

ईरान पर भविष्य में हमला नहीं होगा, इसकी गारंटी सिर्फ और सिर्फ अमेरिका दे सकता है. क्योंकि, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी भी देश के पास इतनी ताकत नहीं है कि अमेरिका से ईरान की ये शर्त मनवा लें और उस पर अमल करा लें. पहला पेच यहीं पर फंसा है. पहले भी अमेरिका शांति वार्ता के बाद कई देशों पर हमला कर चुका है. इनमें लीबिया प्रमुख रूप से उदाहरण है. लीबिया में शांति वार्ता के बावजूद नाटो ने वहां के शासक मु्अम्मर गद्दाफी के साथ मिलकर ऑपरेशन चलाया.

Quincy Institute के वाइस प्रेसिडेंट त्रिता पारसी का कहना है कि गाजा, लेबनान में ट्रंप ने शांति समझौता कराया था, लेकिन वो बेअसर रहा. ईरान को लगता है कि यहां भी ऐसा ही होगा. इसलिए वो पहले चरण में ही दमदारी से अपनी बात रखना चाहता है. डेमोक्रेटिक पार्टी के अमेरिकी सांसद आरओ खन्ना का कहना है कि जब तक ट्रंप चीन और रूस के सामने ईरान को गारंटी नहीं देंगे, तब तक ईरान सीजफायर को लेकर नहीं मानेगा.

सीजफायर पर अमेरिका सीरियस नहीं- अमेरिका युद्धविराम की बात जरूर कह रहा है, लेकिन इसको लेकर तत्पर नहीं है. अमेरिका अपनी शर्तों पर सिर्फ युद्धविराम चाहता है. इतना ही नहीं, उसने पाकिस्तान जैसे देश को मैसेंजर के रूप में चुन रखा है, जिसकी पूरी दुनिया में कोई क्रेडिबलिटी नहीं है. पाकिस्तान आज तक कोई भी सीजफायर नहीं करा पाया है.

दरअसल, अमेरिका चाहता है कि मिडिल ईस्ट में जंग की आग सुलगती रहे, जिससे उसके हथियार उद्योग की चांदी हो. यह तभी संभव है, जब खाड़ी में जंग चलती रहेगी. एक्सियोस के मुताबिक राष्ट्रपति ट्रंप ईरान को लेकर सबसे ज्यादा आक्रामक हैं. ट्रंप चाहते हैं कि ईरान हमला हो, जिससे उसकी सरकार गिर जाए. ट्रंप को अब भी ईरान में तख्तापलट की उम्मीद है.

इतना ही नहीं, अमेरिका की तरफ से सीजफायर का नेतृत्व कर रहे उपराष्ट्रपति जेडी वेंस बीच में ही हंगरी के लिए निकल गए हैं.

सीजफायर से कतर की दूरी- अब तक होर्मुज खुलवाने के लिए समझौते की पहल ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, पाकिस्तान, रूस, चीन, तुर्की, मिस्र जैसे देशों ने की है. ब्रिटेन ने यूरोप के छोटे-छोटे देशों को भी समझौते को लेकर आयोजित एक मीटिंग में आमंत्रित किया था. कुल मिलाकर 45 देश इस सीजफायर की प्रक्रिया में किसी न किसी तरह से शामिल हैं. लेकिन कतर अब तक इस पूरी प्रक्रिया से दूर है.

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