महावीर दर्शन में संवाद की संस्कृति, समाधान की दिशाएं

-स्वामी देवेंद्र ब्रह्मचारी-

The Culture of Dialogue and Pathways to Resolution in Mahavira’s Philosophy

The Culture of Dialogue and Pathways to Resolution in Mahavira's Philosophy
The Culture of Dialogue and Pathways to Resolution in Mahavira’s Philosophy

आज मानव सभ्यता अभूतपूर्व वैज्ञानिक प्रगति के शिखर पर खड़ी है, लेकिन विडंबना यह है कि जितनी तेजी से तकनीक ने दुनिया को जोड़ा है, उतनी ही तेजी से मनुष्य एक-दूसरे से दूर भी होता गया है। संचार के साधन बढ़े हैं, पर संवाद घटा है। सूचना का विस्फोट हुआ है, लेकिन समझ का विस्तार नहीं हो पाया। परिणामस्वरूप व्यक्ति तनावग्रस्त है, परिवार बिखर रहे हैं, समाज विभाजित हो रहा है, राष्ट्र वैचारिक संघर्षों में उलझे हैं और विश्व युद्ध, आतंकवाद, हिंसा तथा अविश्वास के संकट से जूझ रहा है। यदि इन सभी समस्याओं की जड़ खोजी जाए तो एक ही कारण स्पष्ट दिखाई देता है-संवाद का अभाव।

यही कारण है कि आज ‘संवाद से समाधान’ केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है। महावीरायतन फाउंडेशन द्वारा आरंभ की गई यह राष्ट्रीय पहल अत्यंत दूरदर्शी और युगानुकूल है। देश के विभिन्न राज्यों में राज्यपालों, नीति-निर्माताओं, धर्माचार्यों, शिक्षाविदों, समाजसेवियों और विचारकों को एक मंच पर लाकर संवाद की संस्कृति को पुनर्जीवित करने का यह प्रयास वास्तव में भारतीय चिंतन की आत्मा को पुनः प्रतिष्ठित करने का अभियान है।

इसी श्रृंखला में अगस्त 2026 को उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में राज्यपाल श्री गुरमीत सिंह की अध्यक्षता में आयोजित होने वाला ‘संवाद से समाधान’ कार्यक्रम केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकता और वैश्विक शांति का घोष है।

भगवान महावीर का समूचा दर्शन संवाद की भावना पर आधारित है। उन्होंने किसी पर अपने विचार आरोपित नहीं किए। उन्होंने सत्य को अनेक दृष्टियों से देखने की प्रेरणा दी। उनका अनेकांतवाद हमें सिखाता है कि सत्य किसी एक व्यक्ति, एक विचारधारा या एक पक्ष का बंधक नहीं होता। प्रत्येक व्यक्ति अपने अनुभव और दृष्टिकोण के अनुसार सत्य का एक अंश देखता है। जब हम दूसरे के विचार को सुनते हैं, उसका सम्मान करते हैं और उसे समझने का प्रयास करते हैं, तभी वास्तविक संवाद प्रारंभ होता है। यही अनेकांत का व्यावहारिक स्वरूप है।

आज संसार का सबसे बड़ा संकट यह है कि लोग बोलना चाहते हैं, सुनना नहीं चाहते। हर व्यक्ति अपने विचारों को अंतिम सत्य मान बैठा है। परिणामस्वरूप मतभेद मनभेद बन जाते हैं और मनभेद संघर्ष का रूप ले लेते हैं। भगवान महावीर ने चेताया था कि अहंकार सत्य का सबसे बड़ा शत्रु है। जहां अहंकार होगा, वहां संवाद नहीं होगा; और जहां संवाद नहीं होगा, वहां समाधान भी संभव नहीं होगा।

परिवार इसका सबसे सहज उदाहरण है। पिता और पुत्र के बीच पीढ़ियों का अंतर तब तक समस्या नहीं बनता, जब तक दोनों संवाद करते रहते हैं। पति-पत्नी के बीच अधिकांश विवाद विचारों के मतभेद से नहीं, संवादहीनता से उत्पन्न होते हैं। भाई-भाई, माता-पिता और संतानों, दादा-पोते-हर संबंध की मजबूती का आधार प्रेम के साथ संवाद है। जब लोग एक-दूसरे से बात करना बंद कर देते हैं, तब गलतफहमियां अपने आप बढ़ने लगती हैं।

मौन कई बार शांति नहीं, बल्कि संबंधों की मृत्यु का संकेत बन जाता है। समाज में भी यही स्थिति दिखाई देती है। जाति, वर्ग, भाषा, क्षेत्र और विचारधारा के नाम पर बढ़ते तनाव का मूल कारण संवाद का अभाव है। यदि विभिन्न समुदाय नियमित रूप से बैठें, एक-दूसरे की पीड़ा सुनें और साझा समाधान खोजें, तो अधिकांश सामाजिक तनाव समाप्त हो सकते हैं। समाज को कानून से अधिक संवाद की आवश्यकता है, क्योंकि कानून व्यवस्था बना सकता है, लेकिन विश्वास केवल संवाद ही बना सकता है।

राजनीति में भी संवाद का स्थान सर्वाेपरि है। लोकतंत्र की आत्मा चुनाव नहीं, संवाद है। संसद, विधानसभाएं और जनमंच इसलिए बने कि विचारों का स्वस्थ आदान-प्रदान हो। जब राजनीतिक दल एक-दूसरे को शत्रु मानने लगते हैं और संवाद के स्थान पर आरोप-प्रत्यारोप का वातावरण बन जाता है, तब लोकतंत्र कमजोर होने लगता है। स्वस्थ लोकतंत्र वही है जहां तीखे मतभेद हों, लेकिन संवाद के द्वार कभी बंद न हों। विश्व राजनीति में भी यही सत्य लागू होता है। इतिहास साक्षी है कि लंबे से लंबे युद्ध अंततः संवाद की मेज पर ही समाप्त हुए हैं।

चाहे दो राष्ट्रों के बीच सीमाओं का विवाद हो, आर्थिक संघर्ष हो या सामरिक तनाव-अंततः समाधान हथियारों से नहीं, बातचीत से ही निकलता है। युद्ध केवल विनाश देता है, जबकि संवाद भविष्य का निर्माण करता है। बम और मिसाइलें सीमाओं को बदल सकती हैं, लेकिन दिलों को नहीं जोड़ सकतीं। दिलों को जोड़ने का सामर्थ्य केवल संवाद में है।

युद्ध के माहौल में विश्व शांति का शंखनाद है विश्व णमोकार दिवस

विश्व के अनेक महान चिंतकों ने संवाद की इसी शक्ति को स्वीकार किया है। महात्मा गांधी का पूरा जीवन संवाद, सत्य और अहिंसा की साधना था। उन्होंने विरोधियों से भी संवाद का मार्ग नहीं छोड़ा। नेल्सन मंडेला ने वर्षों के अन्याय के बाद भी प्रतिशोध के स्थान पर संवाद को चुना और दक्षिण अफ्रीका को गृहयुद्ध से बचा लिया। संयुक्त राष्ट्र भी अंततः देशों के बीच संवाद का ही वैश्विक मंच है। यह सिद्ध करता है कि मानव सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धियां संघर्ष से नहीं, संवाद से जन्मी हैं।

भगवान महावीर ने केवल बाहरी संवाद की बात नहीं की, उन्होंने आत्मसंवाद का भी संदेश दिया। जो व्यक्ति स्वयं से संवाद नहीं करता, वह दूसरों से भी सार्थक संवाद नहीं कर सकता। आत्मचिंतन, आत्मावलोकन और आत्मशुद्धि महावीर के दर्शन के मूल तत्व हैं। जब व्यक्ति अपने भीतर के क्रोध, अहंकार, लोभ और द्वेष को पहचान लेता है, तब उसका व्यवहार स्वतः मधुर हो जाता है। ऐसा व्यक्ति समाज में संघर्ष नहीं, समन्वय का वातावरण बनाता है।

आज सोशल मीडिया के युग में संवाद का स्थान अक्सर वाद-विवाद और आरोपों ने ले लिया है। लोग एक-दूसरे को समझने के बजाय पराजित करना चाहते हैं। शब्दों की मर्यादा टूट रही है और संवेदनाएं क्षीण होती जा रही हैं। ऐसे समय में भगवान महावीर का संयमित वाणी, अहिंसक विचार और अनेकांत का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। यदि हम बोलने से पहले सोचें, प्रतिक्रिया देने से पहले सुनें और निर्णय लेने से पहले समझने का प्रयास करें, तो अनेक विवाद प्रारंभ होने से पहले ही समाप्त हो सकते हैं।

महावीरायतन फाउंडेशन का ‘संवाद से समाधान’ अभियान इसी दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह केवल विचार-विमर्श का मंच नहीं, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों के बीच विश्वास का सेतु है। जब धर्मगुरु, राजनेता, प्रशासन, बुद्धिजीवी और समाज के प्रतिनिधि एक साथ बैठकर राष्ट्र और मानवता के प्रश्नों पर विचार करेंगे, तब निश्चित रूप से नई दिशाएं निकलेंगी। संवाद की यह संस्कृति भारत की उस प्राचीन परंपरा का पुनर्जागरण है, जिसने सदियों तक दुनिया को सहिष्णुता, समन्वय और सह-अस्तित्व का संदेश दिया।

आज आवश्यकता इस बात की है कि संवाद को केवल मंचों तक सीमित न रखा जाए। प्रत्येक घर में संवाद हो, प्रत्येक विद्यालय में संवाद हो, प्रत्येक कार्यालय में संवाद हो, प्रत्येक पंचायत और संसद में संवाद हो तथा विश्व के प्रत्येक राष्ट्र के बीच संवाद की परंपरा सशक्त बने। यदि संवाद जीवित रहेगा तो विश्वास जीवित रहेगा, विश्वास जीवित रहेगा तो संबंध जीवित रहेंगे, और संबंध जीवित रहेंगे तो मानवता सुरक्षित रहेगी। वर्तमान समय भगवान महावीर के दर्शन को केवल पढ़ने का नहीं, उसे जीवन में उतारने का समय है। उनका अनेकांतवाद हमें मतभेदों के बीच सह-अस्तित्व का मार्ग दिखाता है, उनकी अहिंसा हमें संवेदनशील बनाती है और उनका आत्मसंयम हमें विनम्रता का संस्कार देता है।

इन तीनों का समन्वय ही सार्थक संवाद की आधारशिला है। आज दुनिया को किसी नए हथियार की नहीं, नए संवाद की आवश्यकता है; किसी नई प्रतिस्पर्धा की नहीं, नई समझ की आवश्यकता है; किसी नए संघर्ष की नहीं, नए सहयोग की आवश्यकता है। यदि मानवता को स्थायी शांति, समरसता और विकास का मार्ग चुनना है, तो उसे भगवान महावीर के इस कालजयी संदेश को अपनाना होगा कि जहां संवाद है, वहीं समाधान है; जहां समाधान है, वहीं शांति है; और जहां शांति है, वहीं मानवता का उज्ज्वल भविष्य है।

(प्रख्यात जैन संत देवेन्द्र ब्रह्मचारी महावीरायतन फाउण्डेशन के संस्थापक है)

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