US Midterm Elections 2026: ट्रंप के लिए आसान नहीं चुनावी राह, ईरान युद्ध और महंगाई के बीच सीनेट बचाने की चुनौती
अमेरिका में 3 नवंबर को होने वाले मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के राजनीतिक भविष्य और उनकी सरकार की नीतियों के लिए बेहद अहम माने जा रहे हैं। चुनाव में भले ही राष्ट्रपति पद के लिए मतदान नहीं होना है, लेकिन इसका नतीजा यह तय कर सकता है कि ट्रंप अपने कार्यकाल के अगले दो वर्षों में कितनी आसानी से फैसले ले पाएंगे। रिपब्लिकन पार्टी के सामने प्रतिनिधि सभा और सीनेट में अपना बहुमत बचाने की चुनौती है, जबकि डेमोक्रेटिक पार्टी सत्ता के समीकरण बदलने की उम्मीद लगाए बैठी है।
इस बार चुनावी मुकाबला केवल राजनीतिक वादों और आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है। अमेरिका के आम नागरिकों के लिए पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें, रोजमर्रा की जरूरतों का महंगा होना और ईरान के साथ जारी युद्ध के आर्थिक प्रभाव बड़े मुद्दे बन गए हैं। ऐसे में मतदाताओं की नाराजगी रिपब्लिकन उम्मीदवारों के लिए मुश्किलें बढ़ा सकती है। रॉयटर्स की हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, महंगाई और ईरान युद्ध के कारण पहले से रिपब्लिकन के पक्ष में मानी जा रही कई सीटों पर भी मुकाबला कड़ा हो गया है।
ट्रंप के लिए क्यों अहम हैं 3 नवंबर के मिडटर्म चुनाव?
अमेरिका में मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति के चार साल के कार्यकाल के बीच में होते हैं। इस दौरान प्रतिनिधि सभा और सीनेट की सीटों के लिए मतदान होता है। इसके जरिए जनता को राष्ट्रपति और उनकी पार्टी के कामकाज पर अपनी राय जाहिर करने का मौका मिलता है।
फिलहाल रिपब्लिकन पार्टी के पास अमेरिकी सीनेट में 53 सीटें हैं, जबकि डेमोक्रेट्स और उनके साथ मतदान करने वाले निर्दलीय सदस्यों के पास कुल 47 सीटें हैं। सीनेट में बहुमत हासिल करने के लिए डेमोक्रेट्स को कम से कम चार सीटों का शुद्ध फायदा हासिल करना होगा। यानी उन्हें अपनी मौजूदा सीटें बचाने के साथ रिपब्लिकन खेमे से पर्याप्त सीटें भी जीतनी होंगी।
अगर डेमोक्रेट्स सीनेट में बहुमत हासिल कर लेते हैं, तो ट्रंप के लिए अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाना पहले से ज्यादा मुश्किल हो सकता है। प्रमुख नियुक्तियों, सरकारी नीतियों और विधायी प्रस्तावों पर राजनीतिक टकराव बढ़ने की आशंका रहेगी। वहीं, रिपब्लिकन अगर अपना बहुमत बचाने में सफल रहते हैं, तो ट्रंप को कांग्रेस में अपनी नीतियों के समर्थन के लिए अपेक्षाकृत अनुकूल स्थिति मिल सकती है।
महंगाई और महंगे ईंधन ने बढ़ाई ट्रंप की मुश्किल
चुनाव से पहले अमेरिकी मतदाताओं की सबसे बड़ी चिंताओं में जीवनयापन की बढ़ती लागत शामिल है। घर का खर्च, किराने का सामान, आवास, स्वास्थ्य सेवाएं और ईंधन की कीमतें सीधे आम परिवारों के बजट को प्रभावित करती हैं।
ईरान युद्ध के बाद पेट्रोल और डीजल की कीमतों में उछाल ने इस परेशानी को और बढ़ाया है। एसोसिएटेड प्रेस की 26 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में पेट्रोल की औसत कीमत युद्ध शुरू होने से पहले लगभग 2.98 डॉलर प्रति गैलन थी, जो बढ़कर करीब 4.29 डॉलर प्रति गैलन हो गई। इसी अवधि में डीजल की कीमत लगभग 3.76 डॉलर से बढ़कर 6.35 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई।
इन बढ़ती कीमतों का असर सिर्फ उन लोगों पर नहीं पड़ता जो रोज अपनी कार से दफ्तर जाते हैं। ट्रक चालकों, किसानों, छोटे कारोबारियों और सामान की ढुलाई करने वाली कंपनियों के लिए भी ईंधन महंगा होना बड़ी चुनौती है। परिवहन लागत बढ़ने पर उसका असर खाद्य पदार्थों और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
यही वजह है कि चुनावी बहस में विदेश नीति और घरेलू अर्थव्यवस्था एक-दूसरे से जुड़ गई हैं। मतदाता अब केवल यह नहीं देख रहे कि सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्या कदम उठा रही है, बल्कि वे यह भी पूछ रहे हैं कि उन फैसलों का असर उनके घरेलू बजट पर कितना पड़ रहा है।
ईरान युद्ध बना रिपब्लिकन पार्टी के लिए चुनावी चुनौती
ईरान के साथ जारी संघर्ष ट्रंप प्रशासन के लिए एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है। युद्ध के कारण ऊर्जा बाजार में अस्थिरता और ईंधन की बढ़ती कीमतों ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं।
ट्रंप प्रशासन ने ईरान के खिलाफ अपनी कार्रवाई को राष्ट्रीय सुरक्षा और परमाणु खतरे से जुड़ी जरूरतों के आधार पर उचित ठहराया है। लेकिन आम मतदाताओं के बीच यह सवाल अहम होता जा रहा है कि इस संघर्ष की आर्थिक कीमत आखिर कितने समय तक चुकानी पड़ेगी।
रॉयटर्स की 24 अक्टूबर की रिपोर्ट में एक सर्वेक्षण का हवाला देते हुए बताया गया कि 78 प्रतिशत अमेरिकी नागरिकों ने बढ़ती कीमतों के लिए ट्रंप की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया। यह आंकड़ा इस बात का संकेत है कि महंगाई को लेकर सरकार के प्रति असंतोष चुनावी मुकाबले को प्रभावित कर सकता है।
हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि सभी मतदाता केवल ईरान युद्ध या महंगाई के आधार पर अपना वोट तय करेंगे। राष्ट्रीय सुरक्षा, आव्रजन, स्वास्थ्य सेवाएं और उम्मीदवारों की स्थानीय लोकप्रियता भी परिणामों को प्रभावित कर सकती हैं।
सीनेट की कुछ सीटों पर टिकी निगाहें
इस चुनाव में सीनेट का नियंत्रण कुछ बेहद प्रतिस्पर्धी राज्यों की सीटों पर निर्भर कर सकता है। रिपब्लिकन पार्टी के लिए चुनौती यह है कि जिन राज्यों में ट्रंप को 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में मजबूत समर्थन मिला था, वहां भी अब कुछ मुकाबले पहले से ज्यादा कठिन हो गए हैं।
मेन, अलास्का, ओहायो, नॉर्थ कैरोलाइना, आयोवा और जॉर्जिया जैसे राज्यों की सीटों पर खास नजर रखी जा रही है। इन राज्यों में उम्मीदवारों की लोकप्रियता, स्थानीय मुद्दे, चुनावी अभियान और राष्ट्रीय राजनीतिक माहौल नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं।
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मेन में रिपब्लिकन सीनेटर सुसान कॉलिन्स की सीट डेमोक्रेट्स के लिए महत्वपूर्ण अवसर मानी जा रही है। वहीं, अलास्का में रिपब्लिकन सीनेटर डैन सुलिवन को भी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा, ओहायो और नॉर्थ कैरोलाइना जैसे राज्यों में भी मुकाबले सीनेट के बहुमत का फैसला करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
इन सीटों का महत्व इसलिए बढ़ गया है क्योंकि सीनेट में बहुमत का अंतर बहुत बड़ा नहीं है। कुछ राज्यों में मतदाताओं का सीमित बदलाव भी पूरे सदन के राजनीतिक नियंत्रण को बदल सकता है।
क्या डेमोक्रेट्स पलट सकते हैं सत्ता का समीकरण?
डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए यह चुनाव कांग्रेस में अपनी ताकत बढ़ाने का बड़ा अवसर है। पार्टी महंगाई, स्वास्थ्य सेवाओं की लागत और ट्रंप प्रशासन की नीतियों को चुनावी मुद्दा बना रही है। उसका प्रयास है कि मतदाताओं की आर्थिक चिंताओं को रिपब्लिकन उम्मीदवारों के खिलाफ समर्थन में बदला जाए।
दूसरी ओर, रिपब्लिकन पार्टी के पास भी अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए मुद्दे हैं। पार्टी कर कटौती, सीमा सुरक्षा और आव्रजन पर सख्त नीतियों को अपनी उपलब्धियों के रूप में पेश कर सकती है। चुनाव का परिणाम इस बात पर भी निर्भर करेगा कि कौन-सी पार्टी अपने समर्थकों को मतदान केंद्रों तक लाने में सफल रहती है।
सीनेट के अलावा प्रतिनिधि सभा पर भी सबकी नजरें हैं। दोनों सदनों में बहुमत खोने की स्थिति में ट्रंप प्रशासन को कानून पारित कराने और अपनी प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने में गंभीर राजनीतिक बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है।
चुनाव का नतीजा ट्रंप की बाकी अवधि की दिशा तय कर सकता है
3 नवंबर का मतदान केवल रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टियों के बीच सीटों की लड़ाई नहीं है। यह ट्रंप प्रशासन की नीतियों पर जनता की प्रतिक्रिया का भी एक महत्वपूर्ण संकेत होगा।
अगर रिपब्लिकन पार्टी बहुमत बचा लेती है, तो ट्रंप इसे अपनी नीतियों के समर्थन के रूप में पेश कर सकते हैं। लेकिन अगर डेमोक्रेट्स सीनेट या प्रतिनिधि सभा पर नियंत्रण हासिल कर लेते हैं, तो व्हाइट हाउस और कांग्रेस के बीच टकराव बढ़ सकता है। इससे प्रशासन की विधायी प्राथमिकताओं, नियुक्तियों और नीतिगत फैसलों पर असर पड़ने की संभावना है।
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फिलहाल चुनावी तस्वीर में महंगाई, ईंधन की कीमतें और ईरान युद्ध महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि, अंतिम नतीजा मतदाताओं के मतदान व्यवहार और कुछ अहम राज्यों में जीत-हार के अंतर पर निर्भर करेगा।
