
अल्बर्टा। सूत्रों के अनुसार जब 19 अक्टूबर को अल्बर्टा में रेफरेंडम का दिन होगा, तो ध्यान सिर्फ देश से अलग होने और इमिग्रेशन पर ही नहीं होगा। बल्कि अल्बर्टा के लोगों के सामने चार संवैधानिक सवाल भी रखे जाएंगे, जिनमें सीनेट को खत्म करने से लेकर यह सवाल भी सवाल भी शामिल होगा कि क्या अल्बर्टा को राज्य की उच्च अदालतों में बैठने वाले जजों की नियुक्ति करनी चाहिए? लिस्ट में तीसरा सवाल फ्रार्माकेयर जैसे फेडरल प्रोग्राम से जुड़ा होगा।
फेडरल सरकार इन प्रोग्राम के लिए राज्यों को फंडिंग देती हैं, कभी-कभी कुछ शर्तों के साथ यह राशि प्राप्त होती हैं। रेफरेंडम के अंतर्गत, वोटरों से पूछा जाएगा कि क्या वे संविधान में बदलाव करने की सरकारी कोशिश का समर्थन करते हैं। इस विभाजन का लक्ष्य क्या है?
राज्यों को ऐसे फेडरल प्रोग्राम से बाहर निकलने की इजाजत देना ‘जो स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और सामाजिक सेवाओं जैसे प्रांतीय अधिकार क्षेत्र में दखल देते हैं ‘, बिना इसके कि उन्हें सामाजिक प्रोग्राम के लिए मिलने वाली फेडरल फंडिंग खोनी पड़े। यूबीसी रिसर्च ग्रुप फॉर कॉन्स्टिट्यूशनल लॉ के डायरेक्टर जेफरी सिगालेट ने कहा, ‘अल्बर्टा यहाँ जिसे हम संवैधानिक खर्च करने की शक्ति कहते हैं, उसे सीमित करने की कोशिश कर रहा है।’
संवैधानिक खर्च करने की शक्ति से सिगालेट का मतलब ओटावा की प्रांतों को मनी ट्रांसफर करने और उसके साथ शर्तें जोडऩे की क्षमता से है। आज, अगर प्रांत जुड़ी हुई शर्तों से सहमत नहीं हैं, तो वे फेडरल फंडिंग लेने से मना कर सकते हैं।
लेकिन अगर प्रांतों और फेडरल सरकार के बीच समझौता नहीं होता है, तो इसका मतलब पैसे का इस्तेमाल न हो पाना भी हो सकता है, जो राजनीतिक रूप से अलोकप्रिय हो सकता है। सिगालेट ने कहा, ‘अलग-अलग संवैधानिक जानकार इस पर अलग-अलग राय रखते हैं।’ ‘कुछ लोग इस तरह की चीज़ों को सेंट्रलाइज करने के पक्ष में होंगे… मुझे लगता है कि अल्बर्टा की बात में दम है।’
सिगालेट के नज़रिए से, सरकार के दूसरे स्तरों को भेजी जाने वाली फेडरल फंडिंग पर शर्तें लगाना किसी और के अधिकार क्षेत्र में पॉलिसी बनाने जैसा लग सकता है। उन्होंने बताया कि कुछ जानकारों का तर्क है कि खर्च करने की शक्ति असंवैधानिक है और दूसरों का कहना है कि भविष्य में इस पर कानूनी विवाद हो सकता है।
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टोरंटो यूनिवर्सिटी में लॉ के प्रोफेसर डेविड श्नाइडरमैन ने तर्क दिया कि केंद्र सरकार संवैधानिक रुप से तभी हद पार करती है जब वह प्रोग्राम ‘लागू’ करती है। श्नाइडरमैन ने एक ईमेल में लिखा, ‘जब वह प्रांतीय अधिकार क्षेत्र वाले किसी क्षेत्र में खर्च पर शर्तें लगाती है, तो कोई प्रांत $फेडरल पैसा लेने से मना कर सकता है।’ ‘ध्यान दें कि आधुनिक केंद्रीय खर्च करने की शक्ति के इस्तेमाल को लेकर कोई गंभीर संवैधानिक चुनौती नहीं दी गई है।
राज्य को धन लेना हैं और फिर शर्तों को कमजोर करना पसंद करते हैं, जैसा कि स्वास्थ्य सेवा के मामले में हुआ है।’ यह पहली बार नहीं है जब केंद्र सरकार की खर्च करने की शक्ति पर बहस हुई है। 1980 के दशक में मीच लेक समझौता कैनेडियन संविधान में बदलाव करने की एक नाकाम कोशिश थी।
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प्रस्तावित बदलावों में से एक यह था कि प्रांतों को ‘उचित मुआवज़े’ के साथ राष्ट्रीय साझा-लागत वाले केंद्रीय प्रोग्राम से बाहर निकलने की इजाजत दी जाएं, एक खास शर्त के साथ। सिगालेट ने कहा, ‘मीच लेक की भाषा के तहत, यह अभी भी थोड़ा सीमित था।’ मीच समझौते के तहत, अगर प्रांत राष्ट्रीय लक्ष्यों के अनुरूप कोई कार्यक्रम शुुरु करते, तो वे इससे अलग हो सकते थे।
